मैं उस पीढ़ी में पैदा हुआ जिसे सबसे पहले भाषाओं ने ठगा

रवि प्रकाश की तीन कविताएं और उन पर उस्मान खान की टिप्पणी

वस्तुनिष्ठता और नग्न यथार्थ का कवि : तीन कविताओं पर उस्मान खान की टिप्पणी

क्या कोई ऐसा भी कवि हो सकता है जो अतीत से नहीं, भविष्य से नहीं, वर्तमान से छवि-निर्माण करता है, एकदम थर्राते पारे-सा वर्तमान? क्या स्मृति और स्वप्न के विरुद्ध जिया जा सकता है? हम किस युग में जी रहे हैं? भारत के युवा की मनःस्थिति कैसी है? रवि की कविताओं को पढ़ते-गुनते ये बातें दिमाग़ में आती-जाती हैं. असंगति, निराशा, वीभत्सता, क्रूरता क्या यही सब हमारे युवा के पास रह गया है? अपनी कविताओं से रवि का एक अलगाव-सा दिखता है, जहां हर कोई अपनी बात कहने पर ज़ोर दे रहा है, रवि दूसरों की बातें कह रहा है – एक सच्चे कहानीकार की तरह. वह व्यक्ति नहीं, वर्ग है, जो उसकी कविताओं में पसरा है. वहां किसी एक नायक को, कवि को ढूंढना बेकार साबित होगा.

लेकिन रवि की अपनी बात क्या है? शायद कोई एक बात नहीं, कई बातें हैं, कवि बहुत कुछ कहता है. पर आशापूर्ण बहुत कुछ नहीं. वह २१वीं सदी का निम्न-वर्गीय कवि है. कविताओं में उपस्थित छवियों की बात करें तो इन छवियों का अपना गठन है, जिसकी तुलना किसी अन्य कवि से नहीं की जा सकती, न आज के न कल के. वस्तुनिष्ठता कवि को अलग ढंग से सोचने पर मजबूर करती है, रवि वस्तुनिष्ठता का कवि है. अपने को अपनी कविता के विषय से दूर रखना भी एक साधना है, आजकल ऐसी साधना नहीं की जाती, बल्कि अपने अनुभव को सर्वप्रमुख माना जाता है. रवि की कविताओं में रवि कहीं-कहीं ही है, वह भी असंगति की आड़ में. क्या यह मुश्किल काम नहीं! हज़ारों सालों से दुनिया भर के लोग इस काम में लगे हैं, लेकिन कविता में रहना मुश्किल काम है, कुछ ही कवि यह चुनाव करते हैं. रवि की कविताओं का संसार आज का उपभोक्तावादी संसार है. इस संसार के एक-एक देश में वह घूमता है, बल्कि भटकता है, दौड़ता है. मैं नहीं जानता जीवन में कोई एक रास्ता चुन लेना और उस पर चले-चलना बेहतर है या रास्ते बदलते रहना, लेकिन चलते रहना हर हाल में बेहतर है. रवि के साथ आप शहरों के विस्तार में घूमने लगते हैं और कभी उसके कोर में जाकर बैठ जाते हैं, आप एक कठोर मन से टकराते हैं, यह मन कठोर क्यों हुआ? शायद कवि बार-बार इस प्रश्न पर लौटता है. वह किसी कमरे में है, और कभी सिर्फ अवकाश में, यहां अंधेरा और सीलन है, यह शहरी निम्न-मध्यवर्गीय जीवन है. यहां का एक युवा है, जिसकी आत्मा घिस चुकी है, या घिसती जा रही है, लेकिन यही अपनी कहानी का हीरो है. शहर में रहते हुए एक लड़के के लिए चप्पलों का घिस जाना, आत्मा का घिस जाना है जबकि वह आईने के सामने खड़ा रहता है, बालों को संवारता है. यूं यह युवा सोचता है कि कविता लिखने से कुछ नहीं होता, पर वह क्या करे, वह कविता की दुनिया में ही रहता है. वह अपनी दुनिया को, कविता को बचाने के लिए अपनी जान भी दे सकता है, लेकिन जानता है, कविता लिखने से कुछ नहीं होता – रोटी जल गयी है और नींद के लिए कविता लिखनी है/ झूठ झूठ और सिर्फ झूठ/ इसे सत्ता का विज्ञापन बना दो! कवि के रूप में वह स्वयं को कमज़ोर महसूस करता है, लेकिन इसलिए नहीं कि वह बिम्ब नहीं साध पाता या भावनाओं को रेटौरिक के स्तर तक ले आता है, बल्कि इसलिए कि समाज उसके जन्म से बहुत पहले बांट दिया गया है. उसने जिस सदी में कविता करना शुरू किया, वहां इतिहास, विचारधारा, गंभीरता, वर्ग-विहीन-समाज का स्वप्न सबकुछ समाप्त किया जा चुका है. व्यक्ति अपने अलगाव के चरम पर पहुंचने ही वाला है, भावुक मनुष्य सबसे कमजोर मनुष्य था, हमें न उसे कुछ समझना था, न उसे कुछ समझाना था, सब अपने आप में सब कुछ थे. अजीब सदी थी, जहां योग नहीं, जहां जन्म संभव नहीं, जहां संवाद संभव नहीं, यह स्थिति एक ऐसी मनःस्थिति की ओर ले जाती है, जहां शहरी निम्न-मध्यवर्ग का यह युवक जीवन की वीभत्सता को ही सत्य मान लेता है, उसके लिए जीवन की ख़ूबसूरती अर्थ खो देती है. वह अपने अंतःमन की गहराई में झांकता है, तो उसे वही समाज दिखाई देता है, जिससे उसे नफ़रत है. वह समाज को नंगा करता जाता है और देखता है कि ख़ुद नंगा हो रहा है, वह वस्तुनिष्ठ रहना चाहता है, इसलिए बेरहम है. वह नंगी हक़ीक़तों का कवि है, नग्न यथार्थ, यह यथार्थ का अन्य रूप है, कवि शहर में भटकता इस रूप से टकराता है – “मैं बस में बैठता हूं/ नंगा होने को आतुर मनुष्य/ दुपट्टा ओढ़कर मुझसे बात करता है/ मन होता है एक तेज नस्तर लगा हूं ऊपर से नीचे तक/ कहां जाऊं क्या करूं? विज्ञापित चेहरों में अर्थ तलाशता पतनशील मैं/ अक्सर ही कोई और राग छेड़ देता हूं/ फासिस्ट फासिस्ट और सिर्फ फासिस्ट…!”

कवि की समस्या यह है कि वह रास्ता नहीं चुन पा रहा है, उसके सामने नंगी वीभत्स क्रूर निराशा खड़ी है, वह कभी निराशा के इस पहाड़ से सिर टकराता है, कभी इधर-उधर भागकर कोई पत्थर ले आता है कि पहाड़ टूटे. वह अथक श्रम में लगा है. लेकिन रास्ता नहीं मिलता. कविता ख़ुद एक क़ैदख़ाना बन जाती है. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कवि थोड़ी सांस ले, सोचे, शायद ऐसा कोई औज़ार बनाया जा सकता हो जिससे पहाड़ टूट जाए, शायद कोई मशीन बनाई जा सकती हो, जिससे और तेज़ी से काम हो. कुछ कवि की नज़र का भी दोष लगता है कि शहर में भटकते एक भी साथी नहीं मिला. दुनिया अच्छे लोगों से कभी खाली नहीं होती. हो सकता है कोई और कवि/युवक/नायक किसी और कोने से इस पहाड़ को तोड़ रहा हो – “इक तुम ही नहीं तन्हा उलफ़त में मेरी रुसवा, इस शहर में तुम जैसे दीवाने हज़ारों हैं.”

कवि का जीना कविता का जीना है, कविता सिर्फ़ जिए ही नहीं बल्कि तंदरुस्त भी रहे, राजनीति का ज़माना है, कविता को भी अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान होनी चाहिए, ज़िंदा रहने की जिद ही नहीं, दूसरों के लिए लड़ जाने की जिद भी कविता को पालनी होगी. आज जब कविता जीने-मरने की चीज़ नहीं, बेचने-ख़रीदने की चीज़ भर बन गयी है, ऐसे में कवि का बचा रहना और लड़ते रहना ज़रूरी है. अपनी उम्र बहुत छोटी लगती है… घटनाओं का क्रम कुछ इस तरह बदला कि नायक अपनी मौत मर गया.. पाठकों को यह कथा बहुत ही अरुचिकर लग सकती है!

तीन कविताएं : रवि प्रकाश 

चित्र
मेरे सामने दो रास्ते हैं
मैं एक से निकलकर
ब्रह्मचारी हो जाऊंगा
और दूसरे से निकलकर
एक अथाह गहरे अंधेरे गर्त और पतन का शिकार
चेहरे मुरझाए हुए
जैसे मैं जलती लालटेन के शीशों को
अगले दिन साफ करता हूं
करता रहता हूं, करता जाता हूं
करता ही जाता हूं !
और जब रात होती है
रात खत्म ही नहीं होती
और हत्यारे की जेब से सिगरेट छीननी पड़ती है
रात और सिगरेट: भाड़े का हत्यारा
कितना मुश्किल है एक साथ
रात और सिगरेट की लड़ाई लड़ना
जहां चवन्नियों के भाव देह बिकती है
ऐसे ही रोटी मिलती है
मस्तिष्क सुलगती देंह के धुंए से भरा रहता है
रात और सिगरेट, भाड़े का हत्यारा !
नींद
जो परचून की दुकान पर
बनिए के बही खातों में बंद रहती है
आते-जाते मेरी आंखों को टोकती है
जबकि खुद को गिरवी रख
नींद नहीं ली जा सकती
मुझे सिक्कों के भयानक सपने आते हैं
सपने को बेचकर नींद नहीं खरीदी जा सकती
मेरी नींद!
मैं बस में बैठता हूं, नंगा होने को आतुर
मनुष्य दुपट्टा ओढ़कर मुझसे बात करता है
मन होता है एक तेज नस्तर लगा दूं ऊपर से नीचे तक
कहां जाऊं क्या करूं?
विज्ञापित चेहरों में अर्थ तलाशता
पतनशील मैं अक्सर ही
कोई और राग छेड़ देता हूं
फासिस्ट
फासिस्ट
और सिर्फ फासिस्ट !
धरती पर पसरी पांडुलिपियों को पढ़ रहा हूं
साम्राज्यों के नायक बही खातों में व्यस्त हैं
जिनकी हड्डियां तक चूस ली गयीं
वह उसकी हिफाजत में मस्त है
हिसाब, मेरे पसीने का हिसाब
मेरे पास इसके सिवाय कोई शब्द नहीं है, विन्यास नहीं है
उपमाओं का लिबास नहीं है
क्योंकि जो संचित है, वह रक्त रंजित है!
शहर में एक लड़के के लिए
चप्पलों का घिस जाना, आत्मा का घिस जाना है
जबकि वो आईने के सामने
खड़ा रहता है बालों को संवारता
वह नायक है.
मुस्कुराहटें, जैसे खजुराहो का स्वप्न लिए
ताजमहल की चौखट पर
खीसें निपोर रही हैं
अजन्मा
अभी तक जन्मा ही नहीं.
रोटी जल गयी है और नींद के लिए
कविता लिखनी है
झूठ, झूठ और सिर्फ झूठ
इसे सत्ता का विज्ञापन बना दो !
स्मृतियों की ऊब में
छटपटाते हुए घर हैं, जिसकी चौखट पर
लटकती चमगादड़ें चीख रही हैं
एक तानाशाह
जिसके नींद की गोलियां
हमने खा ली हैं
गीत, बस यही आखिरी गीत !

अधूरे प्रेमपत्र
1
मुझे बताया गया
कि सब कुछ खत्म हो गया है
ये चलते-चलते बीच रास्ते की बात है
इससे पहले मैं इस बात में यकीन रखता था
कि कुछ भी खत्म नहीं होता
मैं टूटी बिखरी आस्थाओं के पास खड़ा था
जब पृथ्वी प्रेम के लिए छोटी हो रही थी
जब पृथ्वी उम्मीद के लिए छोटी हो रही थी
लेकिन जब भी सीने पर हाथ रखता था
पसलियों के नीचे एक संगीत बजता रहता था
ह्रदय था कि धड़कता ही रहता था

2
मैंने चुपचाप एक हहराते हुए सागर को
पार कर लिया है
मैंने वो नाव पकड़ी थी
जो कहीं भी जा सकती थी
मैंने चुपचाप प्रेमपत्रों को जला दिया है
जो अखबारों कि तरह पढ़े जा सकते थे
मैंने चुपचाप
अपनी गलतियों का तर्क तैयार कर लिया है
मैं प्रश्नों के लिए तैयार खड़ा हूं
मैं धीमे धीमे चुपचाप
उसे अपने अंदर से काट रहा हूं
लेकिन अभी भी मेरे भीतर
वो पहाड़ की तरह खड़ी है
मुझे अपनी उम्र
बहुत छोटी लगती है
मैंने घटनाओं का क्रम
कुछ इस तरह बदला है
कि नायक अपनी मौत मर गया
पाठकों को यह कथा
बहुत ही अरुचिकर लग सकती है

3
मैं उस पीढ़ी में पैदा हुआ
जिसे सबसे पहले भाषाओं ने ठगा
फिर संस्कृतियों ने
वो इसके पीछे बदहवास भागता रहा
आखिरकार अपनी रक्षा नहीं कर सका
प्रेम एक अन्धविश्वास की तरह देखा जाने लगा
बंद कमरों की कुलीन हिंसाएं
सड़कों पर ठठरियों की तरह चलती थीं
उनके पास रोने तक का समय नहीं था
एक भावुक मनुष्य
सबसे कमजोर मनुष्य था
दो पाटों में बांट दिया गया हमें
उसे न कुछ समझना था
न उसे कुछ समझाना था
सब अपने आप में सब कुछ थे.
अजीब सदी थी
जहां योग संभव नहीं
जहां जन्म संभव नहीं
जहां संवाद संभव नहीं

4
मैंने उसके सामने कोई शर्त नहीं रखी
वो मुझे जीवन देती थी
वो मुझे जीवन दे सकती थी
वो सर्दियों की शुरुआत थी
जब बिस्तर पसीने से भीगकर
शीतल लगते थे
तुमने उसे कभी धूप में नहीं डालने दिया
तुम मेरे पास थी
तुम जानती थी
एक बेचैन मनुष्य की चिंताएं
मैंने एक धड़कती हुई नस देखी
मुझे अच्छा लग रहा है
इन्हें देखना
कि आंखों से लहू टपकता है

मनः स्थिति
1

जो आदमी अभी यहां आया है
वह अकेला नहीं है
वेश्याएं रिक्शे पर चली आ रहीं हैं
चालक पसीने से भीगकर
हांफ रहा है,
ऊंचाई पर वेश्याओं के साथ चढ़ना आसान नहीं होता
पूरा शरीर दुर्गन्ध और पसीने से लिथड़ा हुआ है
काइयां जम गयीं हैं
फंफूदियों के चकत्ते जंगलों में उग आये हैं
जिसपर झींगुर टहल रहे हैं
मैं रेयूंवे की तरह, सीलन की पर्त तोड़ते हुए
दुनिया के कई हिस्सों में दाखिल हो रहा हूं
पूरी दुनिया सील रही है
सीलन की गंध, पान, पपड़ियां, चूने
पायल, अलता, लिपिस्टिक
सब नाबदान में बजबजाते
इस लैम्पोस्ट के नीचे से बहे जा रहे हैं
पीली रौशनी में डिबिया सिंदूर का
इस रौशनी को बीमार कर देती है
सदियों से दीवारों पर लटकी, शीशों में कैद
बीमार देवियां
सीलन में फूलकर फंफूद से भर गयीं हैं
अस्त्र, रक्त, जीभ, छाती पर सवार देवी
वर, वीणा, वाणी, विद्या की गुनहगार देवी

2
सरहद भाप और रेत की बनी हुई है
जिसपर सिर्फ लोहे के सहारे ही बढ़ा जा सकता है
गति सिर्फ इतनी है
कि बल पर खुरदुरे पैरों का दबाव बना हुआ है
जिसपर सवार वेश्याएं शहर की सैर कर आती हैं
और अपने नखरे से
शहर की जकड़न को थोड़ा ढीला कर आती हैं
जहां सड़कें और शरीर
पान की खुशबू में डूब जाती हैं.
सफेदपोशों के भवन, मेहराबें
जैसे सांस्कृतिक घरानों के डूबते सूरज
चूना और चापड़ कब तक आग में उजला रहेगा
हांफता हुआ मनुष्य दरअसल
विटामिन की गोलियां
अपने साथ रखता है
और अंधेरे में हकीमों से मिल आता है

3
बिस्तर में पड़ा आदमी
धीरे-धीरे दम घोंट रहा है
छत के नीचे एक सुनसान खाली घर
जैसे इस सदी में इलेक्ट्रोनिक मर्चुरी में तब्दील हो गया
झटकों से चेहरा काला पड़ गया
पूरा कमरा
शवों के धुंए से भरा रहता है
हड्डियां चटकती रहती हैं
मांस सूखते रहते हैं
मस्तिष्क सुलगता रहता है
हज़ार पावों से दौड़ते कनखजूरे दहशत में दौड़ रहे हैं
कंदराएं, गुफाएं, सीलन भरी कोठरियां
फंफूद जमी पसलियां
छत के नीचे टंगी हुई देवियां
मैं कहीं और भागने लगता हूं
किताबों से सड़ते हुए गुलाबों की, उथली भावनाओं की
बास आती रहती है.
भव्य ललाट, विवेकी मष्तिष्क के नीचे
एक सुनसान खाली तालाब
विषहीन सांपों से भरा
गहरे विशालकाय बांसों का अंधेरा
काइयां जमी पसलियां
मरी हुई मछलियाँ
सब अतृप्त, अधूरी कहानियां
बंसवारी में डायनें रक्त चूस रही हैं
आदमी मांस नोच रहा है
मेरी तलाश, बुझ चुके आदमी की राख में
अस्थियां, चिंगारियां

4
ये धरती
ये धरती
ये धरती
मृत्यु शिलाओं से टकरा रही है
अरराकर टूट रहे हैं पहाड़
हहराकर नदी रेत में धंसती जा रही है
बवंडर की तरह उठ रही है रेत
लगता है
गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध हो रही है बारिश
उधर हिमालय पर.
धरती रुखी-सूखी है
उसके होंठों पर पपड़ियां जम गयी हैं
पछुआ हवाएं
धरती पर पड़ी दरारों को फैला रहीं हैं
कुछ नए झरने फूटेंगे, कुछ नए मुहाने निकलेंगे
जीवन आखिर जीवन है, हम प्यास बुझाने निकलेंगे.


[रवि प्रकाश हिन्दी के प्रचलित स्फीयर में बहुत कम चर्चित हैं. लेकिन इस स्फीयर में उनकी दखलंदाज़ी बहुत गूढ़ और मानीखेज है, ये बात भी सच है. अपनी राजनीतिक चेतना को किसी बचकाने नारे की तरह न जीने की उनकी कोशिश उनकी कविताओं में संभव होती है. वे संभावनाओं को लेकर कोई दूरगामी दृष्टि नहीं रखते, उनका नज़रिया बेहद समकालीन और वर्तमान है, जो इन छोटे वाक्यों की कविताओं में दर्ज है. इसे उस्मान खान भी लक्षित करते हैं, जो हिन्दी के मजबूत गद्यकार, कवि और कथाकार हैं. रवि प्रकाश की इन कविताओं को और नज़दीक देखने के लिए उस्मान की टिप्पणी बेहतर मदद करती है. इस प्रस्तुति के लिए बुद्धू-बक्सा उस्मान खान और रवि प्रकाश का आभारी है.]

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2 Responses to “मैं उस पीढ़ी में पैदा हुआ जिसे सबसे पहले भाषाओं ने ठगा”

  • param prakash rai Reply

    ‘मृत्यु शिलाओं से टकरा रही है
    अरराकर टूट रहे हैं पहाड़
    हहराकर नदी रेत में धंसती जा रही है
    बवंडर की तरह उठ रही है रेत
    लगता है
    गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध हो रही है बारिश
    उधर हिमालय पर.’
    — ये कवि की संवेदना के ही अनुसरण में शिल्प की मजबूत पकड़ दर्शाते बिम्ब हैं। तीन कविताओं की सबसे अंतिम पंक्तियाँ निश्चय ही घोर निराशा और वेदना के गर्त से निकलकर एक नए जीवन की तलाश का विश्वास बनाए रखती हैं – ‘कुछ नए झरने फूटेंगे, कुछ नए मुहाने निकलेंगे
    जीवन आखिर जीवन है, हम प्यास बुझाने निकलेंगे.’
    क्रूरता और जुगुप्सा के युग में कवि कुछ बेहद कोमलऔर स्नेहमयी बिम्बों की रचना करता है, जो इस डरावने वातावरण को कुछ हल्का करते हैं और निश्चय ही आश्वस्ति का भाव पैदा करते हैं – ‘वो सर्दियों की शुरुआत थी
    जब बिस्तर पसीने से भीगकर
    शीतल लगते थे’

    यह उसकी वेदना और उससे ऊपर उठ सकने की शक्ति ही है जो उसकी अभिव्यक्तियों को इस कदर ईमानदार और प्रामाणिक बना सकी है –
    ‘प्रेम एक अन्धविश्वास की तरह देखा जाने लगा
    बंद कमरों की कुलीन हिंसाएं
    सड़कों पर ठठरियों की तरह चलती थीं
    उनके पास रोने तक का समय नहीं था’

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