अपनी आत्मा के पोर से छू लो तुम मेरी तमाम असफलताएं: श्याम अविनाश

श्याम अविनाश की कविताएं

अधूरे किरदार

बहुत रात गए
अधूरी लिखी कहानी याद आती है
सोचते हुए लगता है
उसमें ऐसा क्या है कि लिखना ज़रूरी है
सब कुछ धुंधला हो जाता है
कहानी के किरदार बैठे रहते हैं कहीं
इंतज़ार में

धीरे धीरे अस्त होता है चांद
वे भी
किसी दिन अचानक वे वापस दिखते हैं
राह चलते किसी एकांत में
और मुझ पर अफ़सोस करते
गुज़र जाते हैं

कथा

उदास चेहरा तैरता है थमता है
वह कुछ कहना चाहता है
बीस बरस का अन्याय अविचार जीते हुए
ठंडे ताप में ताम्बई होता ठोसपन
वहां बना है और वह कुछ कहना चाहता है

हमारे अनिश्चित एकांत में
क्या कहीं कोई जगह है
जहां बैठकर उसे सुना जा सके

ख़ामोश निविड़ निद्रा विहीन पतझर
झरता है बेचैन दर्द के खंड़हरों पर

कामना

आकाश में चांद एक दोना था
महुए से भरा
पहाड़ी रास्ते की मुंडेर पर लबालब

तुम्हारी आंखों का अनहोनापन
और तितली के पंखे-से
कांपते होंठ
कहीं छू रहे थे मुझे

छूना चाहता था तुम्हारी
सफ़ेद कौड़ियों-सी हंसी
इस धुंधलके में भी प्यार
इस चित्कारते समय में भी
चाहता था एक दफे
अपनी आत्मा के पोर से
छू लो तुम मेरी तमाम असफलताएं

लालसा

बौद्ध भिक्षुणी-सा कोई एक चेहरा
पुरातन किसी स्थापत्य की पृष्ठभूमि के पास
अपनी ही देह को खोजता-सा टिका

जागता धीमे-धीमे आदिम लालसा का
अस्त होता मंत्रोच्चार
देह की निर्जनता में भटकता
शांति और उसकी पराजय का इतिहास

रात भर आंधी के बीच
एक लाल वृक्ष झनझनाता

नशा

दूर से आकर जंगल ठहर गया है
छोटी पहाड़ियों के नीले विस्तार के पास
अंधेरेपन के जूड़े में टिका दमक रहा है
चांद का सफ़ेद फूल

कुहासे के स्याह फीकेपन में
कांपता है ख़ामोशी का म्लान हृदय
मादल की आवाज़ के आदिम स्वप्न में
आग को घेरे हैं नृत्यरत परछाइयां

सांस रोके देखता हूं
अनजान नक्षत्रों की अनहोनी डोरियों से बंधा
डोल रहा है चराचर
महुए के पारदर्शी नशे में


[श्याम अविनाश हिन्दी के लिए भरसक नया नाम होंगे, लेकिन सत्तर वर्ष की आयु में वे ख़ुद को कलाओं और साहित्य से समृद्ध मानते हैं. वे बेहद स्थानीय रूप से प्रकाशित हैं. श्याम अविनाश बहरहाल पश्चिम बंगाल के पुरूलिया में अपने परिवार के साथ अपना जीवन बिता रहे हैं. इन और श्याम अविनाश की अन्य कविताओं में एक जो शांत और प्रांजल बहाव मौजूद है, वह क़ाबिल-ए-ग़ौर है. इसलिए भी कि अब इस दुर्लभ काव्यगुण का इसरार एक बीती सम्भावना है, प्रयोग तो फिर भी कम ही होते रहते हैं. देशज होने की कोई ज़िद नहीं है, वह सहज ही मौजूद है, यह भी सुंदर है. श्याम अविनाश से shyamavinash@gmail.com पर संपर्क साध सकते हैं. इन कविताओं के लिए हम आभारी हैं.]

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