केदारनाथ सिंह: शोक का सर्कस में बदल जाना

केदारनाथ सिंह जैसी कविता लिखने के चक्कर में कितनी भ्रूण हत्यायें हुई हैं - इसका कोई हिसाब नहीं. उदय प्रकाश का उदाहरण सबके सामने है, जो केदारजी जैसी कविता लिखने के चक्कर में कहानी के घाट जा लगे.

कृष्ण कल्पित

केदारनाथ सिंह के निधन पर उनके शिष्यों, उनकी कविता के प्रेमियों, हिंदी अख़बारों, चैनलों और कविता का क भी नहीं जानने वालों ने पिछले दो दिनों से धरती से आकाश तक जो धूल उड़ाई है – वह आजकल में बैठ जायेगी.

अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल और विजय कुमार से लेकर सदानन्द शाही, श्रीप्रकाश शुक्ल इत्यादि ने केदारजी के निधन पर जो कुछ भी लिखा है उसमें एक भी आलोचनात्मक पंक्ति नहीं है. युवाकवि और आलोचक अविनाश मिश्र ने ‘न्यूज़लॉंड्री’ पर जो स्मृति-लेख लिखा है – वह एकमात्र आलेख है – जिसमें केदारजी की कविता और उनकी शिष्य-परम्परा का जो आकलन किया गया है, वह ज़रूर पढ़ने लायक है.

अशोक वाजपेयी ने जो स्मृति-लेख लिखा है, वह लगता है केदारजी को कंजूस बताने के लिये लिखा है – जेब से कंजूस पर दिल से उदार.

जयपुर, दिल्ली और पटना की अनेक मुलाक़ातों और तीन-चार बार साथ कि गई यात्राओं में मैंने कभी केदारजी को कंजूसी करते नहीं देखा. एक बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित मंगलेश डबराल के ‘लेखक से मिलिये’ कार्यक्रम के बाद केदारजी मुझे IIC की बार में ले गये. जब बिल आया तो मैंने पैसा देने की कोशिश की तो केदारजी ने मुझे लगभग डाँट दिया और बिल अपने हाथ में लिया और उस पर हस्ताक्षर किये.

आश्चर्य की बात कि मंगलेश डबराल और अशोक वाजपेयी केदारनाथ सिंह की तुलना एक भुला दिए गये महाकवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से करते हैं जबकि अज्ञेय बनाम मुक्तिबोध के बाद रघुवीर सहाय बनाम केदारनाथ सिंह पर कोई तीन दशक तक विमर्श होता रहा है.

केदारनाथ सिंह हिंदी के सर्वाधिक पुरस्कृत, सर्वाधिक सत्तावान, सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे. केदारजी को कभी किसी जुलूस, किसी प्रतिरोध और किसी आंदोलन में ग़लती से भी नहीं देखा गया. केदारजी ख़ुद को प्रगतिशील कहते रहे लेकिन उनकी कोई कविता इस बात की चुगली नहीं खाती.

केदारनाथ सिंह जैसी कविता लिखने के चक्कर में कितनी भ्रूण हत्यायें हुई हैं – इसका कोई हिसाब नहीं. उदय प्रकाश का उदाहरण सबके सामने है, जो केदारजी जैसी कविता लिखने के चक्कर में कहानी के घाट जा लगे.

बेचारे अशोक वाजपेयी पर कलावादी होने की बेकार ही तोहमत है. समकालीन हिंदी कविता के सर्वाधिक कलावादी कवि केदारनाथ सिंह थे. केदारजी कविता के इंटीरियर डेकोरेटर थे. किस बिम्ब को किस बिम्ब के पास और किस कुदाल को किस हल के पास रखना है, यह केदारजी अच्छे से जानते थे. इसे कविता का इंस्टालेशन आर्ट भी कह सकते हैं.

जो केदारप्रेमी केदारजी को अति उत्साह में हिंदी, देश और एशिया का सबसे बड़ा कवि कह रहे हैं उनको शायद यह पता नहीं कि अभी हिंदी में केदारजी से बड़े कवि मौज़ूद हैं. विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे और ऋतुराज – तीन नाम तो तुरंत याद आ रहे हैं.

अतिरंजना शोक को सर्कस में बदल देती है. थोड़ा-सा अधिक नमक स्वाद बिगाड़ देता है – चाहे वह एक देह का दूसरी देह का खाया हुआ नमक ही क्यों न हो !

ऊंट की तलाश में
(केदारनाथ सिंह के साथ जयपुर)

मिर्ज़ा ग़ालिब की कलकत्ता यात्रा जितनी मशहूर है
उतनी ही अख्यात रही आई अभी तक
केदारजी की जयपुर यात्रा

दरअसल वे
एक ऊंट की तलाश में उधर गये थे
जिसे वे दिल्ली के साकेत मोहल्ले के
अपने डुप्लेक्स फ्लैट में पालना चाहते थे
इस काम के लिए उन्हें एक गडरिये की ज़रूरत थी
इस तरह मैं उनके साथ हो लिया था

झमाझम थी बारिश
प्राचीन बिजलियां चिल्लाती थीं
धूप थी तेज़ और तीखी रास्ते में
गलता के पत्थर बंदरों की आँखों की तरह चमकते थे

जब तक हम पहुंचते ऊंटों के झुण्ड तक
हमें घेर लिया कवियों के एक झुण्ड ने
वे चाहते थे केदारजी करें कविता की किताब का विमोचन
कहा केदारजी ने –
कविता पक्की स्याही से छपते ही विमोचित हो जाती है
बकौल शमशेर – लिखी जाकर ही हो जाती है प्रकाशित

एक बन्दर गलताजी की छतरियों पर
एक कुत्ते से अठखेलियां करता था
उनके सम्मान में

केदारजी एक अच्छे ऊंट की तलाश में थे
और मीर को बेतरह याद किये जाते थे
अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गये

आंधियों के आसार ऊंटों के कोहान छू रहे थे
धूल के बवंडर डोलते थे गुलाबी नगर में
प्यार कहीं नहीं था
सिर्फ़ दीवारों पर गुलाबी धब्बे थे

वे दरअसल रचना चाहते थे
ऊंट के पिलाण पर बैठकर
उष्ट्र-छंद में
भयानक खबरों वाला एक महा-काव्य

हम पानी के जहाज़ पर सवार थे
और उसी इतिहास प्रसिद्ध रेशम-मार्ग से गुज़र रहे थे
जहाँ कभी विलुप्त सरस्वती नदी बहती थी

पिछली शताब्दी का एक भूला हुआ मिसरा
एक शमी-वृक्ष की डालियों से लिपटा हुआ था

उनकी यह भी दिली ख्वाहिश थी कि
ऊंट पर चढ़कर समूचे मध्येशिया का एक चक्कर लगाया जाये
जहां कभी लेव तोलस्तोय
अपनी साइकिल की घंटी बजाकर
केदारजी के ऊंट से रास्ता मांगते हों

इस भयानक बेला में
सिर्फ़ ऊंट ही एक भरोसा है
जो खड़ा हुआ है तनकर
आने वाले अकाल के लिए तैयार

उसके लिए खुली हैं दसों दिशाएं!


[कविता और गद्य दोनों ही हिन्दी के कवि और गद्यकार कृष्ण कल्पित की लिखावट हैं. हिन्दी में शोक का एक अतिरंजना अध्याय में तब्दील हो जाना लगभग तय होता है. उस दिशा में कल्पित का यह लिखा अपरिहार्य है. हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह से जुड़े कई ‘किस्से’ सामने आ रहे हैं, लेकिन अपनी स्मृति में उल्लिखित अतिरंजनाएं केदारनाथ सिंह से हमेशा दूर रही है. कल्पित का लिखा उस तथ्यपरकता की मुस्तैद वकालत करता है, जो भावनाओं के आवेग में बह जाती है. बुद्धू-बक्सा कृष्ण कल्पित का आभारी.]

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One Response to “केदारनाथ सिंह: शोक का सर्कस में बदल जाना”

  • यह केदार जी पर सबसे वस्तुपरक और सारगर्भित लेख है ।

    जैसे किसी वैद्य ने मरीज की ठीक ठीक नब्ज पढ़ ली हो ।

    केदार जी कविता को एक प्रॉडक्ट की तरह बरतते थे । एक खूबसूरत पैकेजिंग पर खोखली काव्य गुणवत्ता ।

    जैसे जहाँ लिखा हो प्यार / वहाँ सड़क लिख दो, ठंड में मर जाते है शब्द, उठे सौए हुए धागों …

    ( *कोई कवि गर सचमुच कवि है तो सड़क को इस तरह खराब भाव के लिए उपयोग नही कर सकता )

    ये इतनी अनाड़ी और लापरवाह काव्य बिम्ब हैं क्या कहिये ?

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